वो छोड़ गई मुझे तनहा यादों में
जिसको हर दम माँगा फरियादों में
जो वादे सारे तोड़ गई
खंजर सा दिल में छोड़ गई
नफ़रत तुझसे भी ख़ूब हुई
और सच नफ़रत तुझसे यूँ करता हूँ
जिस राह में तेरा ज़िक्र हुआ
वो राह बदल मैं देता हूँ
फिर कान जो थोड़े खड़े हुए
सुन कर दुनिया की बातें
मैं कुछ - कुछ, कुछ - कुछ सहता हूँ
फिर दिल को संभाले कोने में
ख़ुद से ही यह कहता हूँ
कि जिस राह में तेरा ज़िक्र हुआ
वो राह बदल मैं देता हूँ ..

- Sandeep Kumar Bharti
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