जुबां गुस्ताख़ ना हो
मैं ज़रूरते-हद-हिसाब हुए जाता हूँ
बात तुझ पर ना आए मेरे हमदम
मैं शब-ओ-रोज़ पैमाना-ए-जाम पिये जाता हूँ
कई काफ़िले गुज़रे मेरी निग़ाहों से फिर भी
मैं तेरा ही इंतज़ार किये जाता हूँ
मौत तो तेरी रुस्वाई पर ही हो गई थी
अब तो फ़खत साँस लिए जाता हूँ
चंद महकती बातें
बस उन्हीं को लिए यहाँ से वहाँ हुए जाता हूँ
तड़प जाएगा जब देखेगा आसमां से इक दिन
उसका बंदा ये कैसे ख़राब हुआ जाता है ..

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